क्या केवल गोष्ठियों, सेमिनारों और गीतों से भोजपुरी का उद्धार संभव है?...
लेख रचनाकार- मानवेन्द्र त्रिपाठी (प्रसिद्ध रंगकर्मी व निर्देशक)
आज मैं आप सबके सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समसामयिक विषय पर अपने विचार रखने आया हूँ—क्या केवल गोष्ठियाँ, सेमिनार, लेखन और गीत गाने भर से किसी भाषा का उद्धार हो सकता है? क्या इससे भोजपुरी जैसी समृद्ध भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिल सकता है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भोजपुरी के नाम पर जगह-जगह आयोजन होते हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, कविताएँ पढ़ी जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और भोजपुरी की महानता का गुणगान किया जाता है। यह सब अच्छा है, आवश्यक भी है। इससे भाषा के प्रति भावनात्मक लगाव बना रहता है। लेकिन हमें स्वयं से ईमानदारी से पूछना होगा—क्या केवल इतना कर देने से भोजपुरी को उसका अधिकार मिल जाएगा?
उत्तर है—नहीं।
किसी भी भाषा का उद्धार केवल भावुक नारों और सांस्कृतिक आयोजनों से नहीं होता। भाषा तब जीवित और सशक्त बनती है जब वह शिक्षा, प्रशासन, न्याय, तकनीक, शोध और रोज़गार की भाषा बनती है। जब वह घर की चौखट से निकलकर विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सरकारी कार्यालयों और डिजिटल मंचों तक पहुँचती है।
भोजपुरी केवल लोकगीतों की भाषा नहीं है; यह करोड़ों लोगों की आत्मा की आवाज़ है। इसकी अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा है, अपनी सांस्कृतिक विरासत है, अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति है। फिर भी यदि यह आज संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर है, तो इसका कारण केवल राजनीतिक उदासीनता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक निष्क्रियता भी है।
यदि हम सचमुच भोजपुरी को उसका सम्मान दिलाना चाहते हैं, तो हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे—
पहला, भोजपुरी में उच्चस्तरीय साहित्य और शोध कार्य बढ़ाना होगा।
दूसरा, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भोजपुरी अध्ययन को संस्थागत रूप देना होगा।
तीसरा, भोजपुरी में डिजिटल सामग्री, तकनीकी शब्दावली और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का विकास करना होगा।
चौथा, संगठित जनदबाव बनाकर नीति-निर्माताओं को बाध्य करना होगा कि वे इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करें।
केवल गीत गाने से भाषा जीवित नहीं रहती; भाषा तब जीवित रहती है जब अगली पीढ़ी उसे गौरव के साथ सीखती, लिखती और अपने भविष्य से जोड़ती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भोजपुरी प्रेम केवल मंचीय प्रदर्शन न रहे, बल्कि जनांदोलन बने। हमें दिखावे की गोष्ठियों से आगे बढ़कर जमीनी कार्य करना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी कि जब भाषा सम्मान की लड़ाई लड़ रही थी, तब हम केवल तालियाँ बजा रहे थे या सचमुच उसके लिए संघर्ष कर रहे थे?
आइए, हम संकल्प लें कि भोजपुरी के नाम पर केवल उत्सव नहीं मनाएँगे, बल्कि उसके अधिकार, उसकी पहचान और उसके संवैधानिक सम्मान के लिए निरंतर प्रयास करेंगे। क्योंकि भाषा का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, संगठित कर्म और दृढ़ संकल्प से मिलता है।
यह लेख मानवेन्द्र जी के फेसबुक से लिया गया है जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है——
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